जानिए, इसलिए मनाई जाती है बकरीद...

ईद-उल-अज़हा (बकरीद) एक कुर्बानी है। जिसे देकर अल्लाह को राजी करने का इनाम है। इस दिन खास नबी हजरत इब्राहिम अलैम सलाम जिन्हें अल्लाह का दोस्त खलील भी कहा जाता है। एक बेमिसाल कुर्बानी पेश कर अपने रब का हुक्म बजा लाए थे।
उन्हीं की याद व उन्हीं के तरीफों को अल्लाह ने अपने बंदों पर कयामत के लिए फर्ज करार दिया। हजरत इब्राहिम अलैय सलाय को अल्लाह का हुक्म हुआ कि तुम अपनी बेहतरीन पसंदीदा चीज को हमारे नाम से कुर्बान करो।
चूंकि वो अल्लाह के नबी थे उन्होंने अल्लाह के हुक्म को बजा लाने के लिए सैकड़ों ऊंटों को कुर्बान कर दिए। अल्लाह उनके माल की कुर्बानी नहीं चाहता था। इसलिए एक बार एक ही हुक्म होता रहने पर उन्होंने समझ लिया कि मेरे लिए मेरे लड़के हजरत इस्माइल अलैय्यसलाम से ज्यादा मेहबूब अब कुछ भी नहीं होता है।
वैसे भी एक बाप के लिए उसके बेटे से ज्यादा दूसरा कुछ भी नहीं होता है। फिर वह बेटा जो बड़ी दुआओं के बाद 10 साल की उम्र में बुढ़ापे में उन्हें मिला हो ऐसे प्यारे बेटे को अल्लाह की राह में उसे राजी करने के लिए कुर्बान करने का फैसला कर लेते हैं।
हजरत इब्राहिम अलैयसलाम अल्लाह के पसंदीदा पैगम्बर थे। वे अल्लाह के हुक्म को अच्छी तरह से जानते थे। उधर अल्लाह भी उनका इम्तेहान लेना चाहता था। इसलिए उसने उनके बेटे की कुर्बानी तलब की।
हजरत इब्राहिम इस्माइल अलैय सलाम को अच्छे लिबास पहना कर तैयार करने का कहकर मक्का के बीयाबांन जंगल की तरफ लेकर चल दिए। इंसान के हर अच्छे काम में या रब की इबातद या उसकी खुशी के कामों को पूरा करने में रूकावट पैदा करने के लिए शैतान हर वक्त तैयार रहता है।
यही भी शैतान ने अल्लाह के नबी व उनकी बीबी को बहकाने की हर चंद कोशिश की। लेकिन अल्लाह पर पक्का यकीन रखने वाले अपने रब की रजा के लिए सब कुछ कुर्बान करने के लिए तैयार रहने वाले शैतान के फरेब में नहीं आते हैं।
शैतान ने सबसे पहले हजरत इस्माइल अलैय सलाम की मां हजरत हाजरा अलैय सलाम को कहा कि आपके हजरत इब्राहिम अलैय सलाम बेटे को कुर्बान करने के लिए ले जा रहे हैं आप ने फर्माया कि क्या एक बाप अपने बेटे को कुरबान करने के लिए ले जा सकता है।
इस पर शैतान ने कहा कि यह उनके अल्लाह का हुक्म है। इसलिए उन्हें ले जा रहे हैं। हजरत हाजरा अलैय सलाम एक पाक नबी की बीबी थीं वो अल्लाह की अजमत को जानती थी। ये अल्लाह को मानने वाली थी। इसलिए उन्होंने शैतान मरदूद को कह दिया कि अगर अल्लाह के हुक्म से अल्लाह के लिए कुर्बान करने के लिए ले जा रहे हैं तो ऐसे सौ इस्माइल अल्लाह की राह में कुर्बान करने को तैयार हूं।
पढ़ें: अल्लाह को मनाओ खुदा तुम्हें खुश कर देगा
जब शैतान का बस यहां नहीं चला तो उसने नन्हें से हजरत इस्माइल अलैय सलाम को बहकाते हुए कहा कि तुम्हें मालूम है तुम्हारे वालिद तुम्हें अल्लाह की राह में कुर्बान करने के लिए ले जा रहे हैं। हजरत इस्माइल अलैय सलाम ने एक छोटी सी कंकरी उठाकर शैतान को मारते हुए फर्माया कि अल्लाह के हुक्म से कुर्बान करने के लिए ले जा रहे हैं तो अल्लाह के लिए कुर्बान होना अच्छी बात है।
क्योंकि वो अल्लाह नबी के बेटे थे। इसलिए अल्लाह के इम्तहान में खरे उतरे जब शैतान की यहां भी नहीं चल पाई तो हजरत इब्राहिम अलैय सलाम को ही बहकाकर अच्छे रास्ते से हटाने की कोशिश की लेकिन एक नबी के सामने शैतान की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुईं और अल्लाह के नबी यहां भी अपने रब की रजा के लिए कामयाब रहे।
हजरत इब्राहिम अलैय सलाम ने अपने बेटे हजरत इस्माइल अलैय सलाम को अल्लाह के हुक्म की बात बतलाई तो हजरत इस्माइल अलैय सलान में फर्माया कि अगर अल्लाह का यही हुक्म है तो मैं कुर्बान होने को तैयार हूं। लेकिन आप यह कुर्बानी देख नहीं पाएंगे इसलिए आप अपनी आंखों पर पट्टी बांध लीजिए।
उधर परवरदिगार की पूरी कायनात में एक अजीब शोर था कि अल्लाह के नबी व दोस्त अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे की अजीम कुर्बानी देने जा रहे हैं। इसे रोका जाए इस पर रेहमते आलम की रहेमत जोश में आती है। और उन्होंने एक फरिश्ते को हुक्म दिया जाता है कि हजरत इब्राहिम कामयाब हो गए उनके लिए एक दुम्बा (बकरा) ले जाओ और हजरत इस्माइल की जगह पर रख दो।
इस तरह हजरत इस्माइल की जगह से लाया गया दुम्बा जिबाह हो गया। तब हजरत इब्राहिम अलैय सलाम ने अपनी आंखों की पट्टी खोली तो देखते है कि उनके बेटे हजरत इस्माइल अलैय सलाम पास में खड़े मुस्कुरा रहे हैं। और उनकी जगह पर एक बकरा जिबाह हो गया।
पढ़ें: पवित्र हजयात्रा के दौरान शैतान को इसलिए मारते हैं कंकर
हजरत इब्राहिम अलैय सलाम ने अपने रब का शुक्रिया अदा किया, उनकी कुर्बानी कुबूल हो गई। यह एक ऐसी कुर्बानी थी जिससे रब राजी हुआ और उसने अपने बंदो को बरकत दी। इसलिए तभी से बकरीद यानी ईद-उल-अज़हा मनाई जाने लगी।
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इस्लामी साल में दो ईदें मनाई जाती हैं- ईद-उल-जुहा और ईद-उल-फितर. ईद-उल-फितर को मीठी ईद कहते हैं। जबकि ईद-उल-अज़हा (बकरीद) एक कुर्बानी है। जिसे देकर अल्लाह को राजी करने का इनाम है। इस दिन खास नबी हजरत इब्राहिम अलैम सलाम जिन्हें अल्लाह का दोस्त खलील भी कहा जाता है। एक बेमिसाल कुर्बानी पेश कर अपने रब का हुक्म बजा लाए थे।

उन्हीं की याद व उन्हीं के तरीफों को अल्लाह ने अपने बंदों पर कयामत के लिए फर्ज करार दिया। हजरत इब्राहिम अलैय सलाय को अल्लाह का हुक्म हुआ कि तुम अपनी बेहतरीन पसंदीदा चीज को हमारे नाम से कुर्बान करो।

चूंकि वो अल्लाह के नबी थे उन्होंने अल्लाह के हुक्म को बजा लाने के लिए सैकड़ों ऊंटों को कुर्बान कर दिए। अल्लाह उनके माल की कुर्बानी नहीं चाहता था। इसलिए एक बार एक ही हुक्म होता रहने पर उन्होंने समझ लिया कि मेरे लिए मेरे लड़के हजरत इस्माइल अलैय्यसलाम से ज्यादा मेहबूब अब कुछ भी नहीं होता है।

वैसे भी एक बाप के लिए उसके बेटे से ज्यादा दूसरा कुछ भी नहीं होता है। फिर वह बेटा जो बड़ी दुआओं के बाद 10 साल की उम्र में बुढ़ापे में उन्हें मिला हो ऐसे प्यारे बेटे को अल्लाह की राह में उसे राजी करने के लिए कुर्बान करने का फैसला कर लेते हैं।

हजरत इब्राहिम अलैयसलाम अल्लाह के पसंदीदा पैगम्बर थे। वे अल्लाह के हुक्म को अच्छी तरह से जानते थे। उधर अल्लाह भी उनका इम्तेहान लेना चाहता था। इसलिए उसने उनके बेटे की कुर्बानी तलब की।

हजरत इब्राहिम इस्माइल अलैय सलाम को अच्छे लिबास पहना कर तैयार करने का कहकर मक्का के बीयाबांन जंगल की तरफ लेकर चल दिए। इंसान के हर अच्छे काम में या रब की इबातद या उसकी खुशी के कामों को पूरा करने में रूकावट पैदा करने के लिए शैतान हर वक्त तैयार रहता है।

यही भी शैतान ने अल्लाह के नबी व उनकी बीबी को बहकाने की हर चंद कोशिश की। लेकिन अल्लाह पर पक्का यकीन रखने वाले अपने रब की रजा के लिए सब कुछ कुर्बान करने के लिए तैयार रहने वाले शैतान के फरेब में नहीं आते हैं।

शैतान ने सबसे पहले हजरत इस्माइल अलैय सलाम की मां हजरत हाजरा अलैय सलाम को कहा कि आपके हजरत इब्राहिम अलैय सलाम बेटे को कुर्बान करने के लिए ले जा रहे हैं आप ने फर्माया कि क्या एक बाप अपने बेटे को कुरबान करने के लिए ले जा सकता है।

इस पर शैतान ने कहा कि यह उनके अल्लाह का हुक्म है। इसलिए उन्हें ले जा रहे हैं। हजरत हाजरा अलैय सलाम एक पाक नबी की बीबी थीं वो अल्लाह की अजमत को जानती थी। ये अल्लाह को मानने वाली थी। इसलिए उन्होंने शैतान मरदूद को कह दिया कि अगर अल्लाह के हुक्म से अल्लाह के लिए कुर्बान करने के लिए ले जा रहे हैं तो ऐसे सौ इस्माइल अल्लाह की राह में कुर्बान करने को तैयार हूं।

जब शैतान का बस यहां नहीं चला तो उसने नन्हें से हजरत इस्माइल अलैय सलाम को बहकाते हुए कहा कि तुम्हें मालूम है तुम्हारे वालिद तुम्हें अल्लाह की राह में कुर्बान करने के लिए ले जा रहे हैं। हजरत इस्माइल अलैय सलाम ने एक छोटी सी कंकरी उठाकर शैतान को मारते हुए फर्माया कि अल्लाह के हुक्म से कुर्बान करने के लिए ले जा रहे हैं तो अल्लाह के लिए कुर्बान होना अच्छी बात है।

क्योंकि वो अल्लाह नबी के बेटे थे। इसलिए अल्लाह के इम्तहान में खरे उतरे जब शैतान की यहां भी नहीं चल पाई तो हजरत इब्राहिम अलैय सलाम को ही बहकाकर अच्छे रास्ते से हटाने की कोशिश की लेकिन एक नबी के सामने शैतान की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुईं और अल्लाह के नबी यहां भी अपने रब की रजा के लिए कामयाब रहे।

हजरत इब्राहिम अलैय सलाम ने अपने बेटे हजरत इस्माइल अलैय सलाम को अल्लाह के हुक्म की बात बतलाई तो हजरत इस्माइल अलैय सलान में फर्माया कि अगर अल्लाह का यही हुक्म है तो मैं कुर्बान होने को तैयार हूं। लेकिन आप यह कुर्बानी देख नहीं पाएंगे इसलिए आप अपनी आंखों पर पट्टी बांध लीजिए।

उधर परवरदिगार की पूरी कायनात में एक अजीब शोर था कि अल्लाह के नबी व दोस्त अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे की अजीम कुर्बानी देने जा रहे हैं। इसे रोका जाए इस पर रेहमते आलम की रहेमत जोश में आती है। और उन्होंने एक फरिश्ते को हुक्म दिया जाता है कि हजरत इब्राहिम कामयाब हो गए उनके लिए एक दुम्बा (बकरा) ले जाओ और हजरत इस्माइल की जगह पर रख दो।

इस तरह हजरत इस्माइल की जगह से लाया गया दुम्बा जिबाह हो गया। तब हजरत इब्राहिम अलैय सलाम ने अपनी आंखों की पट्टी खोली तो देखते है कि उनके बेटे हजरत इस्माइल अलैय सलाम पास में खड़े मुस्कुरा रहे हैं। और उनकी जगह पर एक बकरा जिबाह हो गया।

हजरत इब्राहिम अलैय सलाम ने अपने रब का शुक्रिया अदा किया, उनकी कुर्बानी कुबूल हो गई। यह एक ऐसी कुर्बानी थी जिससे रब राजी हुआ और उसने अपने बंदो को बरकत दी। इसलिए तभी से बकरीद यानी ईद-उल-अज़हा मनाई जाने लगी।

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