रियो ओलंपिक में भारत ने अब तक दो मेडल जीते हैं और ये दोनों ही मेडल लड़कियों ने दिलाए हैं. सोशल मीडिया पर शाबाशी देने का दौर चल पड़ा और फीलिंग प्राउड जैसें पोस्ट की बहार आ गई. कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि एक बार फिर देश की बेटियों ने देश की इज्जत बचा ली....!
हर चौथे साल होने वाले खेलों के इस महाकुंभ में भारत से जितनी उम्मीदें थीं, उस पर खिलाड़ी खरे नहीं उतर पा रहे हैॆ. वजह कई हैं, जिसमें सबसे बड़ी वजह ये है कि क्या हम ओलंपिक खेलों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कोई तरजीह देते हैं!
ओलंपिक से पहले जिस खेल में भारत के पदक जीतने की उम्मीद होती है, सिर्फ उन खेलों में अचानक हमारी रूचि जग जाती है.
अगर कोई खिलाड़ी अपने टैलेंट और कड़ी मेहनत से पदक जीत भी जाए तो पदक जीतने के कुछ महीने बाद ही खिलाड़ी टीवी स्क्रीन के साथ-साथ आम आदमी की यादाश्त से भी गायब हो जाते हैं. कुछ लोगों के लिए तो ओलंपिक में अब तक बस दो मेडल जीतना अच्छी खबर है, क्योंकि अब उनको किसी सरकारी नौकरी के परिक्षा के लिए ज्यादा नाम नहीं याद करने होंगे.
ओलंपिक खेलों की ये दशा है तो सोचिए स्पेशल ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों का क्या होता होगा? किस समर्थन के सहारे ये दिव्यांग खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करते होंगे? क्या उनके पदक जीतने से भारत का सम्मान नहीं बढ़ता?
आपको याद दिला दें कि जहां इस साल हम एक सोने के तगमे के लिए सांस रोके बैठे हैं, वहीं पिछले साल ही अमेरिका के लॉस एंजेलिस में संपन्न हुए स्पेशल ओलंपिक वर्ल्ड समर गेम्स में दिव्यांग खिलाड़ियों ने एक-दो नहीं बल्कि पूरे 47 गोल्ड मेडल जीतकर इसी देश का नाम रोशन किया था.
177 देशों के 6,500 खिलाड़ियों के बीच भारत के 275 खिलाड़ियों ने 14 खेलों में कुल 173 मेडल जीते थे.
भारत ने 14 में से 13 खेलों में 47 गोल्ड, 54 सिल्वर और 72 ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए थे.
अमेरिका और चीन के बाद भारत 177 देशों में सबसे ज्यादा पदक जीतने वाला देश था.