शारदीय नवरात्र कल से, महालया आज

आज देवी दुर्गा के आह्वान का दिन है, आज महालया है। जबकि शनिवार को कलश स्थापना के साथ नवरात्र आरंभ हो जाएगा। मंदिरों के साथ घरों में भी कलश स्थापना और मां भगवती की पूजा-आराधना की तैयारी तेज है।

ज्योतिषाचार्य श्रीपति त्रिपाठी और डॉ. राजनाथ झा के अनुसार 1 अक्टूबर को कलश स्थापना के लिए सुबह 7.30 बजे से 12 बजे दिन तक का समय सर्वश्रेष्ठ है। आज महालया के साथ ही पितृपक्ष मेले का भी समापन हो जाएगा।

ज्योतिषाचार्य के मुताबिक ब्रह्म मुहूर्त से शुरू होने वाली अमावस्या के साथ प्रतिपदा तिथि 24 घंटे की है। जबकि सिद्धेश्वरी सेवाश्रम ट्रस्ट के संस्थापक आचार्य संजय कुमार तिवारी उर्फ शशि जी के अनुसार दिन में 11.27 से 12.47 बजे तक अभिजीत मुहूर्त है। यह समय साधकों के लिए महत्वपूर्ण है।  प्रतिपदा सुबह से शाम तक है, इसलिए मां के भक्त शनिवार को समयानुसार दिन में कभी भी कलश स्थापना कर सकते हैं।

उत्तम मुहूर्त में घट स्थापना
नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को उत्तम मुहूर्त में कलश या घट की स्थापना होगी। कलश को भगवान गणेश का रूप माना जाता है। किसी भी पूजा में सबसे पहले गणेश जी की पूजा होती है, इसलिए घट रूप में गणेश जी को बैठाया जाता है।

पूजन सामग्री
- मिट्टी के पात्र और जौ के दाने करीब 250 ग्राम।
- शुद्ध साफ की हुई मिट्टी।
- शुद्ध जल से भरा हुआ मिट्टी, सोना, चांदी, तांबा या पीतल का कलश।
- मोली (लाल सूत्र)।
- आम के पल्लो (पत्ते)।
- कलश ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन।
- साबूत चावल।
- एक पानी वाला नारियल, सुपारी।
- कलश में रखने के लिए सिक्के।
- लाल कपड़ा या चुनरी।
- मिठाई।
- लाल ओढ़उल के फूल व फूलों की माला।

कलश स्थापना की विधि
- कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजास्थल को अच्छी तरह से शुद्ध कर लेना चाहिए।
- फिर एक लकड़ी के पटरे पर लाल कपड़ा बिछाकर उसपर थोड़े चावल गणेश भगवान को याद करते हुए रख देना चाहिए।
- कलश की जगह पर करीब एक फीट की गोलाई में मिट्‌टी बिछाकर उसमे जौ बो देना चाहिए।
- पानी के छींटे मारने के बाद मिट्‌टी के बीचोबीच कलश रख दें। कलश पर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मौली से रक्षासूत्र बांध दें।
- कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम के पत्ते रख मुख को ढक्कन से ढंक दें। ढक्कन को चावल से भर दे।
- फिर एक नारियल को लाल कपड़ा या चुनरी लपेटकर रक्षासूत्र से बांधें। अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करेंं।

कलश स्थापना के मंत्र
कलशस्य मुखे विष्णु कंठे रुद्र समाश्रिताः
मूलेतस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्र गणा स्मृताः
कुक्षौतु सागरा सर्वे सप्तद्विपा वसुंधरा,
ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामगानां अथर्वणाः
अङेश्च सहितासर्वे कलशन्तु समाश्रिताः

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