भागलपुर. 27 साल पहले भागलपुर के दामन पर दंगे का दाग लगा था। मगर इस दाग को धुलने का काम शहर के ही कुछ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने किया। दंगों के बीच साम्प्रदायिक सौहार्द की जो मिसाल उस समय कुछ लोगों ने पेश की थी वह परंपरा आज भी कायम है। दरअसल शहर दंगे की आगोश में था। मजहब के नाम पर सभी एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए थे। शहर में इन्हीं दिनों काली पूजा थी।
दंगे में हाजी ने सहेजी थी काली की मूर्ति ...
हबीबपुर मोमिन टोला में भी मां काली की पूजा होनी थी। यह इलाका मुस्लिम बाहुल्य है। दंगा के बाद वहां काली पूजा करने वाले लोग मंदिर में ही मूर्ति छोड़कर चले गए। हाजी इलियास अंसारी उस समय मोहल्ले के सदर थे। उन्होंने मंदिर में बनाकर रखी गई मां काली की प्रतिमा को सहेज कर घर में रखवाया जिससे कोई शरारती तत्व हिन्दुओं की आस्था को ठेस न पहुंचाए। आज भी वह परंपरा कायम है। हबीबपुर की मोमिन टोला और बढ़ई टोला में मां काली की पूजा आपसी भाईचारे की मिसाल बन चुकी है। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण यहां शांति व्यवस्था बनाए रखने से लेकर प्रतिमा विसर्जन तक में हाजी इलियास अंसारी, मो। कामरान आलम उर्फ गुड्डू और मो। रेहान आलम उर्फ हीरा सहयोग करते हैं। हाजी इलियास मोमिन टोला की निगरानी करते हैं तो मो। कामरान और मो। रेहान बढ़ई टोला में काली पूजा की देखरेख करते हैं। ये दोनों सगे भाई हैं।
भागलपुर दंगे में हाजी ने सहेजी थी काली की मूर्ति ...
27 साल बीत जाने के बाद भी काली पूजा में लोग दंगा को याद करते हैं। शहर दंगे की आगोश में था और मजहब के नाम पर सब एक-दूसरे के दुश्मन बन चुके थे। काली पूजा का समय था। दंगे की वजह से हिन्दू भाई मंदिर में ही मूर्ति छोड़कर चले गए थे। मोहल्ले के सदर हाजी इलियास अंसारी को जब यह पता चला तब उन्होंने मां काली की प्रतिमा को घर में रखवाया। वे खुद निगरानी करते थे और आठ लोगों की टीम भी बना दी थी मूर्ति की सुरक्षा के लिए। दंगा जब शांत हुआ तो खुद उन्होंने वापस लौटे हिन्दुओं के साथ मिलकर अपनी निगरानी में मां काली की प्रतिमा विसर्जित की। हाजी इलियास ने बताया कि 1970 से ही काली मंदिर में तैयारी से लेकर विसर्जन तक वह लोग सक्रिय रहते हैं।लेबल: जरा हट के, Bhagalpur, Bihar, Hindu, India, Muslim, Religion, Riot, Temple