बिहार के लाल ने मैकेनिकल हेडफोन का किया अविष्कार, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हुआ नाम

बिहार की धरती आदि काल से ही ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में काफी उर्वर रही है और समय-समय पर यहां के विद्वानों ने अपने ज्ञान से पूरे विश्व को अचंभित किया है। ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है दरभंगा जिला के लहेरियासराय स्थित कबिलपुर ग्राम निवासी रामनरेश झा एवं आशा देवी के बेटे सुभाष चन्द्र झा ने। सुभाष ने महज 20 मिनट में बेकार स्टेशनरी सामान का उपयोग कर हेडफोन बनाकर एक नया कीर्तिमान बना दिया है।

क्यों खास है मैकेनिकल हेडफोन
एक रिकॉर्ड समय में ठोस माध्यम में ध्वनि संचरण की गति के सिद्धांत के आधार पर एक मैकेनिकल हेडफोन का निर्माण कर सुभाष ने यह साबित कर दिया कि योग्यता व सफलता किसी की मोहताज नहीं होती और मेहनत करने वालों को सफलता जरूर मिलती है। दिलचस्प यह है मैग्नेट स्पीकर एवं इलेक्ट्रिक करेंट या बैट्री के बिना ही यह हेडफोन काम करता है।
अपने इस कीर्तिमान की बदौलत सुभाष का नाम इंडिया बुक ऑफ रिकार्डस के साथ ही लिम्का बुक ऑफ नेशनल रिकार्डस में दर्ज चुका है हो। सुभाष की इस सफलता पर उनके परिवार व ग्रामवासियों के साथ ही मिथिलांचल ही नहीं बल्कि पूरे देश को गर्व महसूस रहा है हो।
बचपन में अक्सर वे नए प्रयोगों से अपने सहपाठियों व शिक्षकों को विस्मित करते रहे हैं। इंटर तक की शिक्षा ग्रहण करने के बाद पटना से ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग का कोर्स किया।

क्यों खास है मैकेनिकल हेडफोन
मैकेनिकल हेडफोन का कॉन्सेप्ट पहली बार दुनिया के सामने लाया है सुभाष झा ने। उन्होंने पहली बार दुनिया के सामने मैकेनिकल हेडफोन की अवधारणा को स्थापित करने का प्रयास किया है। यह उपकरण मुख्य रूप से स्कूली छात्रों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है। स्कूली छात्र इसे एक वैज्ञानिक उपकरण के तौर पर कर सकते हैं।

सामान्य जीवन में प्रायोगिक हो शिक्षा
शिक्षा के प्रति समाज का परम्परागत नजरिया महज एक नौकरी प्राप्त कर लेने तक सीमित हो कर रह गया है। सुभाष झा ने कहा कि हमें शिक्षा को अपने सामान्य जीवन में सैद्धांतिक मात्र न रखते हुए प्रायोगिक होना चाहिए। स्कूली पाठ्यक्रम के विषयों के सिद्धांत और सूत्रों को महज कंठस्थ करने के बजाय उनके मूलभूत आधार को समझने का प्रयास हो।

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