राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के पाठ को आज लोग भूलते जा रहे हैं, लेकिन बापू के इस मूल-मंत्र को उनकी कर्मभूमि के ही एक छोटे से गांव ने इसे बखूबी अपनाया है। दरअसल, आजादी के बाद से इस गांव में अब तक एक भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है।
बिहार में चंपारण के गौनाहा प्रखंड क्षेत्र में एक छोटा गांव कटरांव है। 2000 की आबादी वाला यह गांव आज देश के 125 करोड़ लोगों के लिए नजीर बन गया है।
आदिवासी बहुल है गांव
गौनाहा प्रखंड क्षेत्र के सहोदरा थाना क्षेत्र का कटरांव गांव जो आदिवासी बहुल गांव है। इस गांव के आदिवासी समुदाय के लोग हैं। गांव में कुल 150 घर है। इसकी आबादी लगभग दो हजार है, जिसमें 1300 मतदाता है।
पंचायत का नाम जमुनिया है। गौनाहा प्रखंड का कटरांव गांव जो जमुनिया पंचायत के अन्तर्गत आता है। इस गांव में प्राथमिक और मध्य विद्यालय हैं और पंचायत में हाईस्कूल भी हैं। इस गांव से सहोदरा थाने की दूरी महज तीन किमोलीटर है।
थाने में कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं
आजादी के बाद से इस गांव में अबतक एक भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। यहां के लोग ना तो थाने गए हैं और ना ही कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाया है।
इस गांव में अब तक कोई अपराध नहीं हुआ है जिसे लेकर थाने में एफआईआर दर्ज की गई हो। अगर हल्का विवाद भी हुआ तो उसका निपटारा गांव स्तर पर ही लोगों ने कर लिया है।
गांव के मुखिया सुनील कुमार गढ़वाल ने बताया कि इस गांव के लोग समझदार हैं और जब कभी भी विवाद होता है तो आपस में बैठकर सुलह कर लेते हैं। इस गांव में कभी पुलिस नहीं आती है। आजतक लोग कोर्ट-कचहरी नहीं गए हैं।
गांव की महिला सेम्पू देवी का कहना है कि गांव में झगड़ा-झंझट नहीं होता है। अगर होता भी है तो गांव के लोग आपस में निपटा लेते हैं। बच्चों को उनके मां-पिता खुद शौक से पढ़ाते हैं।
अंग्रेजों की गुलामी देख चुके गांव के बुजुर्ग की माने तो आजतक इस गांव में पुलिस की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। जयनारायण महतो का कहना है कि जब देश आजाद हुआ तब से लेकर आज तक गांव में कभी कोई बड़ा झगड़ा-झंझट नहीं हुआ और अगर छोटा-मोटा मामला हुआ भी तो उसे आपस में बैठकर सुलझा लिया जाता है।
आदिवासी बहुल यह गांव काफी पिछड़ा हुआ माना जाता है, लेकिन इस गांव के लोगों की सोच और जज्बा उन तमाम आधुनिक और शिक्षित कहे जाने वाले समाज से आगे है कहीं।
नरकटियागंज के एसडीपीओ अमन कुमार ने बताया कि कटरांव गांव में अभी तक कोई केस दर्ज नहीं हुआ है। यह एक अच्छी बात है कि गांव में इस तरह का विवाद नहीं होता है कि मुकदमा दर्ज हो। लोग अपने स्तर पर मामले को सुलझा लेते हैं। हम लोग चाहेंगे कि ऐसे गांवों की संख्या और बढ़े।
स्थानीय सांसद सतीश चंद्र दुबे ने बताया कि यह गांव गौनाहा प्रखंड में आता है और आदिवासी बहुल इलाका है। वहां थारू लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। उन लोगों के बीच जो भी थोड़ा बहुत मामला होता है तो आपस में गुमस्ता स्तर पर बैठकर मामले को सुलझा लिया जाता है। यह गांव एक मिसाल है क्योंकि यह बापू की धरती है। गांधी के भितिहरवा आश्रम के बगल में यह गांव है।
ऐसे सुलझाते हैं मामले
दरअसल, थारू समाज के हर गांव में एक गुमस्ता होता है जिसमें गांव के सभी मामले का निपटारा होता है। इस गांव में भी गुमस्ता स्तर पर ही स्थानीय विवाद को सुलझा लिया जाता है। अभी तक कोई ऐसा मामला नहीं हुआ जो थाना या कोर्ट कचहरी तक पहुंचे।
गांव के बुजुर्ग विष्णु महतो की माने तो गुमस्ता के साथ गांव के लोग बैठकर विवाद को सुलझाने का प्रयास करते हैं। साथ ही उस समय दोषी व्यक्ति को गुमस्ता और गांव वालों की सहमति से दंड भी दिया जाता है। अगर कोई व्यक्ति गुमस्ता का फैसला नहीं मानता था तो उसकी पिटाई की जाती है।
अभी इस गांव के गुमस्ता शिवनारायण गौरो हैं। गांव के ही दीपनारायण महतो और गंगा महतो में भी 10-15 साल पहले जमीन को लेकर विवाद हुआ था, जिसे गांव के लोगों ने बैठकर गुमस्ता स्तर पर सुलझा लिया गया था।लेबल: जरा हट के, हिंदी समाचार, Bihar, Block, Champaran, India, Panchayat, Village