मैंने कुछ पुरुषों से पूछा, कि आप अपनी पत्नी को ‘तू, तेरे को, तुझे’ की जगह ‘आप या कमसे कम ‘तुम’ बोलकर क्यों नहीं संबोधित कर सकते अगर वो आपके लिए इतनी ही सम्मानीय पात्र हैं? विश्वास करें, यह प्रश्न उन सभी के लिए अचरज का विषय था.
वो सभी इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थे, उन सभी के उत्तर अजीबोगरीब थे. उन में से किसी ने कहा - ‘तू’ शब्द से यह बोध होता है की हमारे बीच घनिष्ठता है. किसी ने कहा, हम मित्र के जैसे हैं...क्या दोस्त एक दुसरे को ‘तू’ बोलकर संबोधित नहीं करते? एक अन्य व्यक्ति ने व्यथित अंदाज में कहा “तो? क्या मैं उसको ‘आप’ बोलकर संबोधित करूँ? ये देवी है? पूजा करूँ इसकी?” यह सभी उत्तर उन सभी के लिए निजी था. फिर भी कुछ लोग अलग होते हैं, लेकिन वैसे लोग कुछ ही हैं. अपने एक मित्र जो कि अपनी पत्नी को हमेशा “आप” बोलकर संबोधित करते, उनके जवाब को सुनकर निश्चित ही मुझे गर्व हुआ. उनका जवाब था “अगर वो मेरा सम्मान करती है, तो मैं क्यों नहीं?”
यह वृतांत मुझे मेरी एक मित्र ने इसलिए भेजा क्योंकि मैंने बात करने के क्रम में उनसे ‘तुम’ बोलकर कुछ पूछ लिया. और प्रश्न के बाद व्याकुल होकर उनका उत्तर था “Tum? %) theek hona?”
हम एक दुसरे को पिछले आठ महीनों से जानते हैं और हमारे बीच परिचय से लेकर आज तक जो भी, जैसी भी वार्ता हुई हो हमने हमेशा ‘आप’ शब्द को आचरण में लाया. दरअसल मैंने ‘तुम’ शब्द का प्रयोग सिर्फ और सिर्फ उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए की थी. वो अलग बात है की आगे उन्होंने मेरे लिए ‘तुम’ बोलने का विकल्प “आप जैसा चाहे वैसा बोल सकते” बोलकर खोल दिया. इसके बावजूद मैंने आगे उन्हें सभी बातें स्पष्ट कर दी और फिर बातें पूर्व में जैसी चलती थी वैसी ही चल रही.
भाषा और रिश्तों का बड़ा गहरा संबंध है, English निश्चित ही विश्व में एक बड़े पैमाने पर बोली जाने वाली भाषा है लेकिन जब रिश्तों को नाम देने का वक़्त आता हो या संबोधन का, यह हिंदी, संस्कृत और भारतीय मूल के भाषाओँ के सामने बौनी दिखती है. उम्र कोई भी हो, संबंध कैसा भी हो, पुरुष हो या स्त्री हो अंग्रजी में सभी के लिए सिर्फ एक शब्द है “YOU” लेकिन जब बात हिंदी की हो तो उम्र और संबध के हिसाब से “आप या तुम के बीच चुनाव करते हैं, संस्कृत में “त्वम् अथवा भवान् और अगर स्त्री हैं तो भवति का प्रयोग करते हैं.
हमारे भारत में कहा जाता है की यहाँ 15-20 किलोमीटर पर भाषा-बोली, खान-पान, रहन-सहन बदल जाता है, चूँकि मैं बिहार से आता हूँ इसलिए यहीं की बात करूँगा. यहाँ प्रमुखता से भोजपुरी, मैथली, अंगिका, मगही, ठेठी भाषा बोली जाती है. वर्तमान समय में भोजपुरी में गाए जाने वाले अश्लील-भद्दे गानों को छोड़ दिया जाए तो भोजपुरी जैसी मधुर बोली बिहार में और नहीं, मैथली की मिठास इसे अग्रिम पंक्ति में रखती है, अंगिका, मगही और ठेठी का भी अपना ठाठ-बाट है. हमारे यहाँ हर रिश्ते का अलग नाम है चाचा-चाची, मामा-मामी, फूफा- फुआ, ताऊ, मौसा-मौसी लेकिन अंग्रेजी में माँ के रिश्तेदार हैं तो ‘Maternal’ और पिताजी के खेमे से हैं तो ‘Paternal’ लगाकर काम निकाल लो. खैर हम यहाँ भाषा और रिश्ता का जनरल नॉलेज नहीं खोलेंगे.
कनक्लूजन के रूप में एक बात तो स्पष्ट रूप से कहा ही जा सकता है कि Hindi & Sanskrit are the language which bridges the respect in relation during interaction.
अब आते है मुद्दे पर, देश के दिल दिल्ली में युवाओं के बीच संवाद होता है तो पता ही नहीं चलता की प्यार से बात कर रहे की झगड़ रहे हैं वहां पर “तू, तेरे को, मेरे को” बोलकर बात करने का चलन है! व्यक्तिगत रूप से मुझे यह चलन कभी नहीं सोहाया क्यूंकि इसमें भावना का पूर्ण आभाव है. इस चलन का मैं आलोचना नहीं कर रहा लेकिन वहां पर वाद-विवाद, बातों में जीवंतता की घोर कमी है. दिल्ली में एक मित्र है मेरे अभिषेक कुलश्रेष्ठ जी उन्हें मुझसे हमेशा शिकायत रहती है की यार आप बिहारी लोग “हम-हम” करके क्यों बात करते है, आज इस पोस्ट के माध्यम से उन्हें और ऐसा संशय रखने वाले सभी मित्रों को बता देना चाहता हूँ की हम बिहारी बात-चीत में ‘हम; शब्द का प्रयोग इसलिए करते है क्योंकि “हम बिहारी समग्रता, एकता और सहयोग में विश्वास रखते हैं.”
शब्दों से संस्कार और किया जाने वाला सम्मान झलकता है, बिहार- और उत्तर प्रदेश में लगभग जगहों पर आज भी पति का नाम नहीं लिया जाता, लेकिन आधुनिकीकरण के युग में बोली-चाली उन्नत तो हुई लेकिन अंदर का भाव मिटता चला गया, घनिष्ठता दर्शाने के चक्कर में मिलने वाला सम्मान खोता जा रहा है. जैसा की इस पोस्ट के सबसे ऊपर जिक्र में है कि “किसी व्यथित व्यक्ति ने बोला की क्या उनकी पत्नी देवी है जो सम्मान से उन्हें ‘तुम’ या ‘आप’ बोलें. उन जैसे तमाम लोगों के लिए यही कहूँगा की मनुस्मृति के अध्याय ३, श्लोक संख्या ५६(56) में कहा गया है,
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।५६।।
जहां स्त्री जाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं।
जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं।
यह श्लोक पृथ्वी पर रहने वाली सभी नारियों के लिए समान रूप से प्रयोज्य है, चाहे वो हमारी माँ हो या बहन, महिला मित्र या एक अलग परिवार से विदा होकर आने वाली आपकी अर्धांगिनी, सभी समान सम्मान के पात्र हैं.
इसलिए आगे से कोशिश करें की यथासंभव बात चीत के क्रम में स्त्री का उतना ही सम्मान हो जितना आप अपने सम्मान के प्रति चिंता करते हैं. क्योंकि "जैसा आप बोयेंगे वैसा ही तो पायेगें."
‘आप’ शब्द आचरण में लाने से व्यक्तिगत रूप से आप छोटे नहीं हो जाएँगे अथवा आपका सम्मान नहीं कम हो जाएगा. इसलिए एक निवेदन स्वरुप ही समझकर बोल-चाल में उम्र और जेंडर को ताक़ पर रखकर सभी के साथ वार्ता के क्रम में ‘आप’ शब्द आचरण में लाकर देखीए अलग ही आनंद की अनुभूति होगी, बांकी अंग्रेजी मीडियम जो टेम्पररी हिंदी बोलते उनसे भी यह आग्रह है.
नारी सशक्तिकरण नारों और भाषणों से नहीं होगा, यह सामाजिक बीड़ा हमें ही उठाना है इसलिए एक नेक कार्य समझकर स्त्री का सम्मान करें.
आपने यहाँ आकर अपना बहुमूल्य समय दिया उसके लिए ह्रदय से अभिनन्दन.